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बिहार में जेडीयू में आंतरिक कलह, वर्चस्व की लड़ाई खुलकर आने लगी सामने

जेडीयू के अंदर चल रही वर्चस्व की लड़ाई अब खुल कर सामने आ गई है। नीतीश कुमार के प्रेशर में भले ही आरसीपी सिंह ने राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ दिया हो, लेकिन खुद आरसीपी सिंह और उनके समर्थक मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह को अपना नेता मानने से भी परहेज कर रहे हैं। साथ ही उपेन्द्र कुशवाहा को भी पार्टी का नेता मानने से इनकार कर रहे हैं।

जेडीयू से लेकर बिहार के तमाम सियासी गलियारे में ये बात जगजाहिर हो चुकी है कि आरसीपी सिंह कैसे मंत्री बने। मंत्रिमंडल के विस्तार में जेडीयू को कितनी सीटें मिलेंगी ये तय करने बहजेपी के पास भेजा था लेकिन आरसीपी खुद मंत्री बन गये। नीतीश इंतजार करते रह गये कि आरसीपी सिंह ये आकर बतायेंगे कि बीजेपी कितने मंत्री पद दे रही है, लेकिन आरसीपी खुद शपथ लेने निकल लिये। नीतीश कुमार की हालत ये थी कि वे ये भी नहीं बोल सकते थे कि उनके सबसे करीबी, 23 साल के साथी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने ही दगा दे दिया। जानकार बताते हैं कि आरसीपी सिंह तो जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ने तक को तैयार नहीं थे। नीतीश कुमार को सख्त तेवर अपनाना पड़ा तब जाकर आरसीपी सिंह ने जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ा। नीतीश कुमार की मानें तो पार्टी में सब कुछ ठीक है ना कोई गुटबाजी है और ना ही कोई नाराजगी।

वर्चस्व को लेकर जेडीयू के अंदर लड़ाई 6 अगस्त को सबके सामने आ गई, जब राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह पटना पहुंचे। पूरे शहर में स्वागत पोस्टर लगाया गया, लेकिन किसी पोस्टर में ना आरसीपी सिंह को जगह मिली ना ही प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा को। इसे लेकर आरसीपी सिंह के समर्थक भड़क गए और अब आरसीपी सिंह के स्वागत में लगे पोस्टर से ललन सिंह और उपेन्द्र कुशवाहा को आउट कर दिया गया। एक दिन के बाद फिर पोस्टर बदला ललन सिंह और उपेन्द्र कुशवाहा की पोस्टर में एक छोटे से फ़ोटो के रूप में इंट्री हुई। अब आरसीपी सिंह समर्थक खुलेआम कह रहे है कोई हमारे साथ चूक करेगा तो हम भी उसके साथ चूक करेगें।

बड़े भारी मन से आरसीपी सिंह ने पद छोड़ तो दिया, लेकिन उन्होंने अपना खेल शुरू कर दिया। ललन सिंह के अध्यक्ष बनने के बाद ही आरसीपी सिंह ने अपने समर्थकों को मैसेज कर दिया था कि वे 16 अगस्त को मंत्री बनने के बाद पहली दफे पटना आ रहे हैं। उन्हें खास तौर पर ये कहा गया कि स्वागत का इंतजाम ऐसा होना चाहिये जिससे कि पार्टी में मैसेज चला जाये कि आरसीपी सिंह की क्या हैसियत है। 6 अगस्त को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर पटना आये ललन सिंह के स्वागत के बंदोबस्त के बाद आरसीपी सिंह ने अपने लोगों को और टाइट किया। पार्टी की लड़ाई अब सड़को पर पहुंच गई। इन सबसे राजद काफी खुश और उत्साहित है।

दरअसल जेडीयू के संगठन का पूरा काम पिछले 10-12 सालों से आरसीपी सिंह ही देख रहे थे। जेडीयू के प्रदेश पदाधिकारियों से लेकर जिलाध्यक्षों में ज्यादातर आदमी आरसीपी सिंह के अपने लोग हैं। ऐसे ज्यादातर लोगों की दुविधा ये है कि ललन सिंह उन्हें गले लगायेंगे नहीं। नीतीश कुमार से वे डायरेक्ट बात कर नहीं सकते। लिहाजा वे यही चाह रहे हैं कि आरसीपी मजबूत बने रहे। आरसीपी सिंह के मजबूत रहने पर ही पार्टी में उनकी चलेगी। उधर आरसीपी सिंह खुला खेल खेलने के मूड में आ चुके हैं।

2022 में आरसीपी सिंह का राज्यसभा का कार्यकाल पूरा हो रहा है और जो हालात बन रहे हैं उसमें आरसीपी सिंह का फिर से राज्यसभा जाना भी मुश्किल होगा। ऐसे में आरसीपी सिंह अब खुले खेल पर उतर गये हैं। वे अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं। वे दिखाना चाहते हैं कि जेडीयू उनकी मर्जी के बगैर नहीं चलायी जा सकती।

नीतीश कुमार को वे गच्चा दे चुके हैं। ये दीगर बात है कि 23 सालों से नीतीश के साथ साये की तरह रहने वाले आरसीपी सिंह के सीने में इतने राज दफन हैं कि नीतीश बहुत चाह कर भी आरसीपी से पल्ला नहीं झाड़ सकते। लेकिन नीतीश ने अपने सबसे प्रमुख मैनेजर ललन सिंह को आगे कर दिया है। आरसीपी सिंह की ललन सिंह से जमाने से चली आ रही दोस्ती टूट चुकी है। ललन सिंह अब उपेंद्र कुशवाहा को आगे कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद ललन सिंह दो दफे उपेंद्र कुशवाहा के घर जा चुके हैं। ये वही ललन सिंह हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि अगर नीतीश कुमार खुद न बुलायें तो वे सीएम हाउस भी नहीं जाते। हालांकि बीजेपी मानती है की यह पार्टी के अंदर की बात है।

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